मेरा इस विषय पर लिखना या कुछ लिख कर ॥ शीर्षक "हिंदुत्व और भारत" डालना मेरे इस लेख को धार्मिक रूप प्रदान कर सकता है ... किंतु मेरा मूल उद्देश्य सनातन वैदिक अवम भारतीय परम्परा की राष्ट्र और समाज के प्रति महत्ता को अपने शब्दों मे प्रकट करना है.... ।
भारत एक धर्मं प्रधान राष्ट्र रहा है ..... और दूरस्थ भविष्य मे भी यह मृत्युंजय राष्ट्र आपने प्राण धर्मं हिंदुत्व की महक से विश्व मे जाना जायगा .... ।
यहाँ यह जान लेना आत्यंत आवशक है की मूल भारतीय जीवन दर्शन अवन सनातन वैदिक संस्कृति मे धर्मं का अर्थ कर्तव्य होता है न की किसी पूजा पद्धति या पंथ का रूप... ।
वहीँ दूसरी और हिंदुत्व से मेरा अभिप्राय उस महान जीवन दर्शन से है जिसका उद्गम स्थल सिन्धु घटी सभ्यता रही है और जिसने अपने इस जीवन दर्शन मे आदि काल से हो रहे मानव सभ्यता के विसक को सम्मिलित किया है ... जिससे इस भारत भी की धारा को विश्व मे पावन और अभ्हिन्न पहचान विश्व मे प्रदान की है .... ।
मुझे बचपन की एक सीख याद है की अगर ख़ुद अपना इतिहास बनाना है तो हमे इतिहास का पूर्ण और सत्य ज्ञान नितांत आवश्यक है .....किंतु यह बहुत हे दुर्भाग्य पूर्ण बात है की जिस प्रकार मैकाले के मानस पुत्रो ने भारत के इतिहास को तोड़ मरोड़ के प्रस्तुत किया है वह इस राष्ट्र की भावी पीढियों को इस महान , गौरवमई और पावन धारा के संस्कारो से दूर कर रहा है .... ।
भारत सर्वदा एक अखंड धार्मिक और सांस्कृतिक सोहार्द का प्रतिक रहा है .... आर्याव्रत की जन्ननी इस भू की पहचान हे इसकी सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और धार्मिक विद्वत्ता रही है .....किंतु आज भारत को धर्मनिरपेक्ष पेश करने के लिए जिस प्रकार से यहाँ के मूल निवासियो को आत्मिक प्रताड़ना दी जा रही है वह घोर निंदनीय अवम घ्रणित योजना है ... ।
प्रथ्मांश हमे इस बात मे कोई संदेह नही होना चाहिए की भारत वर्ष की प्रथम सभ्यता आर्य या हिंदू ही थी ...
हिंदुत्व का मूल संदेश हे सेवा और कर्तव्य है .... तभी तो यहाँ rajao को राज शक्ति राज धर्म के पालन के लिए दी गई है .... यहाँ समाज के हर व्यक्ति को अधिकार उसके कर्तव्यों की पूर्ति के साधन के रूप मे प्रदान किए गई है .....भारतीय संस्कृति मे राष्ट्र और समाज को सर्वोपरी रखते हुए अधिकारों से अधिक कर्तव्यों को महत्व दिया गया है ... ।
धर्म,राष्ट्र,संस्कृति और समाज हीत के लिए अपने प्राणों की बलि देना एक महान परोपकार का काम है आईसी शिक्षा हमे हमारे ऐतिहासिक ग्रंथो से मिलती है ....वही दूसरी और समाज के उत्थान के लिए निस्वार्थ भावः के कर्मो की प्रखरता इस जन्ननी जन्म भूमि की विशेषता है ... ।
वासुदेव कुटुम्बकम के तत्त्व ज्ञान को अपनाने वाली इस सभ्यता ने यहाँ आने वाले सभी लोगो को अपने अतिथि देवो भवः के सिधांत से मंत्र मुघ्ध किया है .... किंतु यह शायद इस धारा की विडम्बना रही है की "एकम सद विप्रः बदुह वेदांती " के तत्त्व को मानने वाली इस संस्कृति के साथ विश्वासघात होना जैसे एक प्रचलन बन गया है ... ।
जिस राष्ट्र की शिक्षा ही सकारात्मक हो जहा के कण कण मे,मनुष्य के अंतर्मन मे ,प्रकर्ति के प्रत्येक स्तंभ मे ईश्वरीय तत्त्व के वास का दर्शन हो वह के जन मानस मे ईश्वरीय भक्ति और ईश्वरीय शक्ति मे गहरी आस्था होना स्वाभाविक है ..... इस पावन संस्कृति के प्रणेता ब्रहम्मा , विष्णु और महेश है और अगर यह कोई काल्पनिक पात्र होते तौ इनके प्रति इनती प्रगाढ़ आस्था को रखते हुए यह राष्ट्र शायद हे जीवित रह सकता था... ।
अगर हम अपने धर्म ग्रंथो व पौराणिक प्रसंगों का अध्यन करेंगे तौ पींगे की हमने जिन्हें इश्वर माना वे सामान्य मानव की तरह अवतरित हुए थे ...... समाज उत्थान अवम बुराइयों के अंत के लिए किए गए उनके कार्यो की वजह से हे हमने उन्हें ईशवर या ईश्वर का अवतार माना है ......जिससे एक बात स्पष्ट होती है की इस संस्कृति मे विचार व कर्म को प्रधानता दी गई है ....... कोई व्यक्ति पूजनीय तभी हो सकता है जब उसके विचार और कर्म समाज मे वन्दनीय हो... ।
जब जब इस धारा या संस्कृति पैर संक्रमण काल आया है तब तब इस पावन भू पर सुनीति और दुर्नीति ने धर्म और अधर्म ने संघढ़ किया है और धर्म और सुनीति ने विजय श्री प्राप्त की है ....
मेरा दरूद मत है की कोई भी पंथ या मत बुरा नही होता .....किंतु उसके प्रचार या विस्तार के तौर तरीके समाज के लिए घटक हो सकते है .... ।
अखंड भारत के हिंदू राष्ट्र की महान कल्पना मेरे व प्रत्येक राष्ट्र भक्त के अंतर्मन मे आस्था के केन्द्र मे विराज्यमान है ... और मेरा दृढ़ मत है की भारत अखंड तभी होगा जब यहाँ के लोग ख़ुद को हिंदुत्व की पावन व गौरवमई संस्कृति से धन्य और गौर्वंतित पाएँगे ... ।
इस मृत्युंजय राष्ट्र भारत को एक सुरता मे बंधने का कार्य इस राष्ट्र की पारंपरिक सनास्क्र्ती हे कर सकती है ... ।
।। जय जय भारत ।।
Wednesday, August 27, 2008
Monday, August 25, 2008
मेरे सपनो का भारत....
शायद यह एक ऐसा विषय है जिस पर लिखना मेरे बस के बाहर है ।
व्यक्ति के मानस पर अंकित विचारो को व्यक्त किया जा सकता ही.... किंतु उसके अंतर्मन मे हिलौरे ले रही स्वपनीय कल्पनाओ को लेख द्वारा अभिव्यक्त या मुद्रित करना बहुत हे कठिन है ......
भारत एक ऐसा राष्ट्र जहा मन्दिर भी सोने के....ज्ञान इतना की तक्षिला नालंदा जैसे विश्व विद्यालय .... आस्था इतनी की पत्थर मे भी देवता जाग्रत हो उठे....न्याय इतना की माँ अपने एक मात्र पुत्र को हाथी के पैरो तले कुचलवा दे .... भक्ति इतनी की देवी देवता साक्षात् दर्शन दे .... आध्यात्म इतना की विश्व गुरु की संज्ञा मिल जाए ..... रण कोशल इतना की विश्व विजेता भी यहाँ दम तोड़ जाए ..... भाई चारे मे वासुदेव कुटुम्बकम का पाठ हो... विश्व को पहली मानव सभ्यता का ज्ञान हमने कराया .... विश्व को अंको की देन ,देने वाला महान भारत .....
किंतु आज यह कहा है ?? कहा है भारत का वह गौरवमई इतिहास??
आज के भारत को देख मन विचलित है....उस अद्भुत गौरव को गाथा आज देश मई मजाक का विषय है....राष्ट्र प्रेम की बातें कोरी बकवास और राष्ट्र पुनर्निर्माण की भावना मुर्खता और कट्टरता का प्रतिक .... और इस राष्ट्र के पहचान उस महान जीवन संस्कार का मजाक उड़ना मानव सभ्यता और फैशन बन गया है ....
आज देश मे भ्रष्टाचार , गरीबी , आतंकवाद, साम्प्रदायिकता इतनी बढ़ चुकी है की इस महान वृक्ष की जड़े भी शायद अब हिलने लगी है .....
किंतु मेरे सपनो का भारत इसके ठीक विपरीत एक धार्मिक , समर्थ , सम्रध और सशक्त राष्ट्र के रूप मे मानो आस्था के केन्द्र के रूप मे ह्रदय के मध्य स्तिथ है
हिमालय इस माँ का मुकुट है ..... तो सागर इसके पर धो रहा है ...... दहाड़ते हुए सिंह के मुख की आकृति वाला गुजरात दुश्मनों को ललकार रहा है ..... गंगा , यमुना , नर्मदा जैसे सहस्त्रो नदिया इस देश का मेला धो रही है .... भारत का विजय पताका कंधार मे हो और धर्म राष्ट्र की नींव .... भाईचारा हमारी पहचान हो और वीरता का लोहा दुनिया माने .....
मेरे सपनो के भारत मे न तो कोई भूखा सोता होगा न कोई दुःख मे आकेला रोता होगा..... बंधुत्व की परिभाषा भारत की परपाटी मे हो हमारे भारत का धर्म राष्ट्र धर्मं हो और आराध्य देवी विधाता स्वरुप माँ भारती .... वंदे मातरम के उद्घोष से व्यक्ति व्यक्ति का रोम रोम प्रफुल्लित हो जो मस्तक पर सूर्य सा तेज़ और बाजुओ मे लोह का दम भर दे ....
इस भारत मे सत्य की पूजा हो और इमानदारी कर्म...
राष्ट्र भक्ति की ऐसी मिसाल कायम हो की विश्व का प्रत्येक व्यक्ति भारत मे जन्म लेने की कामना करे ......
और अंत मे सिर्फ़......
पथ कठिन हो या सरल हो चलने का सामन मांगे .....
तेज तूल बलिदान पुलकित देश का सम्मान मांगे।
चिर विजय की कामना हर स्वस्थ मनन अपना रहे है ...
देश जागे देश जागे मंत्र सब गूंजा रहे है ॥
!! जय जय भारत !!
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