मित्रों बड़ा अजीब समय आया हुआ है देश मे ... बाहर की बात मुझे ज्यादा पता नहीं इसलिए अपने देश की ही बात कर रहा हूँ ... पता नहीं जो बात कर रहा हूँ आपको कैसी लगेगी ...
हम बात करते हैं सहयोग की ... सरल सहज व्यक्तित्व की ... रचनात्मकता की ... अच्छी बातें को ज़िन्दगी मे जोड़ने की ... किन्तु मेरा यह लेख एक बयान - ए - हकीकत है उन तथाकथित रचनात्मक लोगो के लिए जो सहजता , सरलता ओर समरूपता का आडम्बर ओडे हुए हैं ....
यह लेख एक कटाक्ष है उन लोगो पर जो समाज को सुधारने निकले हुए हैं ... विशेष कर राजनेता , समाज सेवी या पत्रकारिता जगत ....
मित्रों ,
पिछले कुछ दिनों से मे एक बात अनुभव कर रहा था की यह जो रचनात्मकता बढाने निकले हुए लोग हैं ... यह जो समाज सुधारक कौम है यह खुद कितनी इमानदार है ? ईमानदारी से मेरा मतलब आर्थिक भ्रष्टाचार नहीं है ईमानदारी से मेरा मतलब है व्यवहार मे हमारी सेधान्तिक प्रत्तिबद्धता .... आदर्शों के प्रति हमारा समर्पण ओर सम्मान ....
देखने मे आता है की यह रचनात्मक लोग आत्मा प्रशंशा सुनने के आदि हो चुके हैं ... इन्हें अब काम पहले तो करना ही नहीं है ... यह चाहते हैं की इनकी उपस्तिथि ही काम की प्रमाणिकता हो जाये ... जैसे कोई नेता अगर किसी गाँव मे सभा करने पहुच गया है तो समझिये वहा विकास हो गया ... नेता दूर दराज के किसी गाँव के कोने मे अपने द्वारा ... ( सरकारी कर्त्तव्य जिसको नेता अपने द्वारा किया गया एहसान बताता है ) करवाया गया तथाकथिक विकास के काम का धिन्डोरा दुसरे हे गाँव मे बजने लगता है ... वो भी इतनी जोर से जैसे की वो बस नई ईमारत पर खड़ा हो कर महान विकास की इबादत लिख रहा हो ... वो अपनी मोजुदगी को ही विकास का काम समझाने मे लगा होता है ...
दूसरा जब यह काम करना चाहते हैं तो न जाने क्यों यह ऐसा चाहते हैं की अच्छा काम सिर्फ ओर सिर्फ यही करे .... जैसे एक नेता है किसी दल का अब वो दुसरे दल के नेता को कुछ काम ही नहीं करने देता ... उदाहरण के लिए मैं अपने मोहल्ले का नेता हूँ ओर अपने क्षेत्र के चुने हुए पार्षद के पास अपने मोहल्ले मैं पोधारोपन हेतु कुछ पोधे नगर निगम से उपलब्ध करवाने का अनुरोध करने जाता हूँ ... जो नगर निगम के कई कामो मे से एक काम है .... तो वहां मुझे कुछ घंटो का इंतज़ार कर के नेता जी के दर्शन होते हैं किन्तु नेता जी मुझे भगा देते हैं यह कहते हुए की जाओ न अपनी पार्टी के नेता के पास वो ही दिलवाएगा अब तो .... तो कहने का मतलब यह है की रचनात्मक काम हमारा विरोधी कैसे कर ले ... इस बात की जलन है ॥ इर्षा है या शायद भय है ....
अब पत्रकारिता समूहों को ही देख लीजिये ... यह तो सभी को बेनकाब करने निकले हैं ... किन्तु शायद अब खुद हे पर्दानशीं हुए जा रहे हैं .... इनका तो काम है अलख जगाना ... जनजाग्रति लाना ... लेकिन अभी तो खुद ही नोटों की सेज पर सोये हुए प्रतिक होते हैं ...
भाई आप एक कार्यक्रम करवाइए ... जनता का विषय को ... समाज लीजिये महंगाई का हो ... आतंकवाद का हो ... भ्रष्टाचार का हो ... एक संगोष्टी करवाइए ओर उसमे अतिथि किसी भी एक अखबार के पत्रकार को बुलवा लीजिये फिर देखिये आपका मीडिया कवरेज आप रहेंगे हेड लाइन में ... किन्तु सिर्फ उसी ही अखबार मे जिस अखबार में वो पत्रकार बंधू काम करते हैं ... बहुत अच्छा कार्यक्रम था ... ज्वलंत ओर गंभीर विषय भी था ... हुआ भी सही तरीके से ... जो विषय निकले उनको जनता तक पहुचना भी चाहिए था ... पहुचने का काम शुरू आपने किया था बढाने की ज़िम्मेदारी मीडिया की थी किन्तु हुआ क्या ... उल्टा ... ठीक उल्टा ... दुसरे अख़बारों मे खबर क्यों नहीं ? क्युकी वो नहीं चाहते की किसी ओर अखबार ... जिसको वो अब अपना प्रतियोगी मान बैठे हैं उसका कोई पत्रकार न्यूज़ मे आये कुछ अच्छा काम करते हुए .... अब आप दुसरे अख़बारों के कार्यालय पहुचते हैं यह जानने की उन्होंने खबर क्यों नहीं छापी ... वे लोग पहले तो ताना मरेंगे ... पुचंगे क्यों कैसा रहा यार कल का कार्यक्रम ... पता ही नहीं चला कुछ खबर हे नहीं आई ...... ॥ या कहेंगे क्यों अब बुलाओगे किसी को वहां से ( जहाँ से आपके अतिथि आये थे ) ...
अब देखिये यहाँ तक तो ठीक था की भाई चलो यह लोग तो पैसा लगा कर बैठे हैं कमाने ही निकले हैं बाज़ार मे ....
किन्तु उनका क्या जो त्याग की मूर्ति बन बैठे हैं .... सन्यासी हो गए हैं या सन्यासी जैसे रहने लगे हैं ....
यह तथा कथिक संत , समाज सेवी ओर महात्मा लोग भी आज कल ग्लामौरस हो चले हैं ....
भाई एक संत मुझे मिले एक दिन ... बड़े संत थे ... टीवी पर अक्सर कथा करते दीखते हैं ... करोड़ों की ज़मीं देखने मे लगे थे अपने आश्रम के लिए ... मैंने पूछा महाराज करेंगे क्या ऐसी जगह पे इतना महंगा आश्रम बना कर तो बोलते हैं बेटा अपने बहुत से भक्त हैं जो विदेश मे रहते हैं ... बहुत से बड़े बड़े व्यापारी , नेता , अधिकारी हैं .... उनकी सुविधा के लिए बना रहे हैं अपना क्या है ... बड़ा अच्छा लगा जान कर ... बड़े दिल वाले नज़र आये महाराज जी .... किन्तु धीरे धीरे पोल खुली ... एक बार मे उनसे चर्चा कर रहा था ... चर्चा चल रही थी कुछ महान विभूतियों पर ... मैंने जिक्र किया पास के ही एक गाँव के एक दिवंगत संत का ... बड़े ही महान थे वे ... गाँव वालो की शिक्षा हेतु उन्होंने बहुत उपक्रम किये थे ... पुरे गाँव को नशा , व्यसन चोरी से मुक्त किया था उन्होंने .... जब उस संत के बारे मे मैंने इन (बड़े) महाराज जी से बात की तो कहते हैं ... वो ... अरे क्या था वो ... कुछ आता जाता नहीं था उसको ... भिकारी था वो तो ... रहता था एक झोपडी मे ... वेड पूरण शाश्त्र पड़ने से कोई महान हो जाता है क्या .... मुझे देखो इतने भक्त हैं की फुर्सत ही नहीं ....टीवी वाले तक मेरी कथा की रेकॉर्डिंग दिक्खाते हैं उसको जानता कौन है ?
तो कहने का मतलब यह है की इनका भी अपना एक स्टेटस हो गया है ... इनको भी बंगला , मोटर चाहिए, पहचान चाहिए ... ज़रूरत के लिए नहीं ऐशो आराम के लिए .... उपर से अब इनको अपने हाल फिलहाल के भक्तो से ही फुर्सत नहीं मिलती ... जो भक्त नहीं वो इनकी कृपा का अधिकारी नहीं ... ओर भक्त बनने के लिए आपको बड़ा आदमी बनना पड़ेगा नहीं तो फिर छोटे मोटे संतो के आशीर्वाद मे ही गुजरा करते रहिये ....
अब आज कल की समाज सेवा देखिये ... आज कल समाज सेवा एक धंधा बन गई है ... यह मे नहीं सरकार कह रही है ... आपको विश्वास नहीं हो तो समाज सेवा की संस्था रजिस्टर करवाने वाले कार्यालय पर जा कर पूछ लीजियेगा .... वहां जो फॉर्म मिलता है संस्था रजिस्टर करवाने का उसमे जब सदस्यों की जानकारी मांगी जाती है तो उसमे धंधा या पेशा वाला कोलम भरने मे समाज सेवा लिखा जाता है ... सरकार आपको पेशेवर समाज सेवक बना रही है .....
सब बड़े बड़े समाज सेवी लगे हैं चंदा लेने मे ... सरकारी दफ्तरों मे जूता घिस रहे होते हैं फंड लाने के लिए ... वो लेकर आते हैं पैसा रिश्वत देकर ... अब आप हे सोचिये जो आदमी रिश्वत देकर पैसा लता है ... वो पैसा जो उसको समाज मे दान के रूप मे लगाना होता है ... वो आदमी उस पैसे के साथ कितना इन्साफ करेगा ?
अब यह जो समाज सेवी हो गए हैं यह भी कभी दुसरे समाज सेवी की तारीफ करते नहीं मिलेंगे ... कोसते रहेंगे दुसरे की संस्था को ...दुसरे के काम को छोटा ओर अपनी सेवा को ही महान बताते रहेंगे .... अब तो इन्हें भी अखबारों मे छाना है ...
अख़बारों मे अपनी मोजुदगी ओर राजनीती मे अपनी ताकत दिखने के लिए जितना आज कल के संत ओर समाज सेवी उतारू हैं उतना तो शायद मीडिया की राजनीती करने वाले कुछ दफ्तर पसंद नेता तक नहीं हैं ।
खैर ...
मित्रों यह तो मैंने बात कह दी ... इस तरह के उदाहरण देने बैठ गये तो समझो लिख चुके ....
यह सब भूमिका ... बातें इसलिए आपको बताई की आप शायद मेरी इस बात को समझने ओर उसको अपने स्तर पर सुधरने का प्रयास करेंगे की :
सेवा कभी भी प्रतियोगिता का हिस्सा नहीं बनना चाहिए .... जब कभी भी सेवा प्रतियोगिता का हिस्सा बनेगी वो सेवा नहीं स्वार्थ हो जायगी .... क्युकी फिर उसमे सफलता या असफलता की महत्वाकंषा होगी .... ओर जहाँ यह बातें हो वह स्वार्थ अपने आप ही आ जाता है .... ओर अगर सेवा मे स्वार्थ आगया तो समझो वो व्यापर है ....
दूसरा रचनात्मकता को प्रोत्साहन मिलना चाहिए फिर वो किसी की भी हो ... कहा गया है न ... "बात हक की हो तो कुबूल करो फिर यह न पुचो किसने कही है "
तो मित्रों यह जो दौर है विकास का इसमे इन बातों पर ध्यान देना बेहद ज़रूरी है ... अगर यह भूल हमसे लगातार होती रही तो मान लीजिये की हम कभी भी समुचित ओर सर्वांगीन विकास नहीं कर सकेंगे ... हम विकास तो करेंगे किन्तु खंड - खंड मैं .... छंद - छंद मे ... ओर ऐसा विकास विनाश का ही दूसरा रूप होता है क्युकी एक सर्व स्पर्शी नहीं होता .... इससे समाज का विकास नहीं होता ... विकास होता है सिर्फ सुविधाओं का ... जैसे सड़क, बिजली,पानी इत्यादि ...... ओर बिना समाज के विकास किये हम अगर सुविधाओ का ही विकास करते रहे तो हम उन सुविधाओं का दोहन या दुरुपियोग होने का मार्ग खोल रहे हैं ....
इसलिए मित्रों आवयश्कता है की हम हमारे आस पास पाए जाने वाले ऐसे तथा कथित समाज सुधारकों को समझाए ... ओर अगर वो न समझे जिसकी की बहुत उम्मीद भी है तो हम खुद ही कुछ अच्छा कर ले... लेकिन हम ध्यान रखे की हमको थोडा दूर रहने है इन सब बातों से .... हम खुद हे वैसे न बन जाये ..... हम खुद ही न दौड़ने लगे इस प्रतियोगिता बनती सेवा ओर रचनात्मकता की दौड़ मे ....
.. जय जय भारत ..