Thursday, February 24, 2011

शर्म...!!!

कुछ भवने जो उभरी उड़ीसा मे बंदी बनाये गए जिला कलेक्टर ओर इंजिनियर की रिहाई में हुए राष्ट्रीय अपमान की...
में स्वागत करता हूँ बंदियों का उनसे मेरा कोई राग द्वेष नहीं है ... मेरी भावनाए समाज में दबे स्वाभिमान को जगाने के लिए हैं ...रोती सरकार अब शर्म आणि चाहए घुटने के बल चलने में ....


यह कैसी मौज?
लज्जित है फौज,
ये कैसा सौदा ?
रोया अहिंसा का मसौदा,
यह कैसी जवानी?
रोई शहीदों की क़ुरबानी,
यह आँखों मैं कैसा पानी ?
याद आई दादी नानी ,
यह किसकी रिहाई ?
इससे अच्छी है चिर जुदाई .
यह कैसी शर्त ?
जिसमे पंहुचा स्वम्बिमान गर्त,
यह कैसी बेबसी ?
जो सम्मान ले धसी.
यह कैसी मज़बूरी ?
जो करते हो खुनियों की हजुरी .
यह कैसी सरकार ,
जो न मिटा सके अहंकार
यह कैसी हिम्मत ,
जो छीने हमारी किस्मत ?
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छप गया सूरज देख यह सौदा...
तैयार हुआ जब बातचीत का मसौदा.............
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कैसी जुदाई,
यह कैसी रिहाई,
राजनीती भी गरमाई,
जनता भी भरमाई,
गद्दारों की नियत भी इतराई,
...धरा की बेबसी है उसकी तन्हाई,
खैर!क्यों सोचे हम यह पीड पराई....
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हुआ अंत इन्तहाई इंतज़ार का ...
आया पंछी लिए बयां एक जुदाई का ...
कैसा था वो कहा था वो बतलाये गा ...
लिखेगा एक अध्याय नया क़ुरबानी का ...
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मजूर तंत्र था या नाकाफी होसले ...
खैर जो भी था पंछी पहुचे अपने घोसले ...!!!
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न्यायाधीश छुटा मुजरिमों की रिहाई पर,
तंत्र बिका मज़बूरी की कीमत पर
रोई वसुंधरा अपने बेटों की गद्दारी पर

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याद आया कांधार..
उजागर हुई नपुंसकता ...
खोया भारती का तेज,
सजी दलालों की सेज,
टुटा हिम्मत का सपना,
...सोचा गाँधी ने भी यह नहीं था अहिंसा का सपना अपना ...!!!