में स्वागत करता हूँ बंदियों का उनसे मेरा कोई राग द्वेष नहीं है ... मेरी भावनाए समाज में दबे स्वाभिमान को जगाने के लिए हैं ...रोती सरकार अब शर्म आणि चाहए घुटने के बल चलने में ....
यह कैसी मौज?
लज्जित है फौज,
ये कैसा सौदा ?
रोया अहिंसा का मसौदा,
यह कैसी जवानी?
रोई शहीदों की क़ुरबानी,
यह आँखों मैं कैसा पानी ?
याद आई दादी नानी ,
यह किसकी रिहाई ?
इससे अच्छी है चिर जुदाई .
यह कैसी शर्त ?
जिसमे पंहुचा स्वम्बिमान गर्त,
यह कैसी बेबसी ?
जो सम्मान ले धसी.
यह कैसी मज़बूरी ?
जो करते हो खुनियों की हजुरी .
यह कैसी सरकार ,
जो न मिटा सके अहंकार
यह कैसी हिम्मत ,
जो छीने हमारी किस्मत ?
......................................................................................
.............................................................................................
............................................................................................................
...............................................................................
....................................................................................
................................................................................................