Tuesday, April 26, 2011

!!!

हुआ हास पुण्याई का ,
अब वक़्त न रहा राम की दुहाई का,
यह कैसा खेल है भावनाओ की जुदाई का ,
नहीं मिलता कोई खुदा यहाँ खुदाई का ..
यह मौसम ही प्रकृति बन गया लगता है ,
और जमाना हो गया रुखाई का ,

हो गई बर्फ पिघल कर अब वायु ,
न रही ईमान की अब कोई आयु ,

जमा था जो ,
डाटा था जो ,
अडिग , अटल , अविचल ,
निश्चय कर संकल्पित
निभर , अविनाशी महा प्रतापी
वो महात्मा सा ...
अब हो गया है वीभत्स , कुरूप , शुद्र हे दृष्टि कुल्भंजक ,

वक़्त का साया अंधियारे से भी गुजरता है ,
सुना था वो अविलम्ब बस आगे बढता है ,
किन्तु ऐसा लगता है..
जैसे इस युग मैं वह सिर्फ ,
अँध्यारो को खोजता , बुनता , पाता ...
और उसे पा कर बस वही ठहरता है ,
मैंने भी खोजा जीवन को और
पाया बस गम को ,
ढूंडा जब कोई महात्मा ,
तो जाना नहीं होती अब ऐसी कोई प्रेतात्मा ...!!!